(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

सभापर्व ~ महाभारत | Mahabharat Sabha Parv In Hindi


॥ श्रीः ॥
2.35. अध्यायः 035
Mahabharata - Sabha Parva - Chapter Topics
नकुलस्य पश्चिमदिग्विजयः॥ 1॥
Mahabharata - Sabha Parva - Chapter Text

वैशम्पायन उवाच॥

नकुलस्य तु वक्ष्यामि कर्माणि विजयं तथा।
वासुदेवजितामाशां यथाऽसावजयत्प्रभुः॥ 2-35-1(12816)
निर्याय खाण्डवप्रस्थात्प्रतीचीमभितो दिशम्।
उद्दिश्य मतिमान्प्रायान्महत्या सेनया सह॥ 2-35-2(12817)
सिंहनादेन महता योधानां गर्जितेन च।
रथनेमिनिनादैश्च कम्पयन्वसुधामिमाम्॥ 2-35-3(12818)
ततो बहु धनं रम्यं गावाढ्यं धनधान्यवत्।
कार्तिकेयस्य दयितं रोहीतकुपाद्रवत्॥ 2-35-4(12819)
तत्र युद्धं महच्चासीच्छूरैर्मत्तमयूरकैः।
मरुभूमिं स कार्त्स्न्येन तथैव बहुधान्यकम्॥ 2-35-5(12820)
शैरीषकं महेत्थं च वशे चक्रे महाद्युतिः।
आक्रोशं चैव राजर्षि तेन युद्धमभून्महत्॥ 2-35-6(12821)
तान्दशार्णान्स जित्वा च प्रतस्थे पाण्डुनन्दनः।
शिबींस्त्रिगर्तानम्बष्ठान्मालवान्पञ्च कर्पटान्॥ 2-35-7(12822)
तथा मध्यमकेयांश्च वाटधानान्द्विजानथ।
पुनश्च परिवृत्याथ पुष्करारण्यवासिनः॥ 2-35-8(12823)
गणानुत्सवसङ्केतान्व्यजयत्पुरुषर्षभः।
सिन्धुकूलाश्रिता ये च ग्रामणीया महाबलाः॥ 2-35-9(12824)
शूद्राभीरगणाश्चैव ये चाश्रित्य सरस्वतीम्।
वर्तयन्ति च ये मत्स्यैर्ये च पर्वतवासिनः॥ 2-35-10(12825)
कत्स्नं पञ्चनन्दं चैव तथैवामरपर्वतम्।
उत्तरज्योतिषं चैव तथा दिव्यकटं पुरम्॥ 2-35-11(12826)
द्वारपालं च तरसा वशे चक्रे महाद्युतिः।
रामठान्हारहूणांश्च प्रतीच्याश्चैव ये नृपाः॥ 2-35-12(12827)
तान्सर्वान्स वशे चक्रे शासनादेव पाण्डवः।
तत्रस्थः प्रेषयामास वासुदेवाय भारत॥ 2-35-13(12828)
स चास्य गतभी राजन्प्रतिजग्राह शासनम्।
ततः शाकलमभ्येत्य मद्राणां पुटभेदनम्॥ 2-35-14(12829)
मातुलं प्रीतिपूर्वेण शल्यं चक्रे वशे बली।
स तेन सत्कृतो राज्ञा सत्कारार्हो विशाम्पते॥ 2-35-15(12830)
रत्नानि भूरीण्यादाय सम्प्रतस्थे युधां पतिः।
ततः सागरकुक्षिस्थान्म्लेच्छान्परमदारुणान्॥ 2-35-16(12831)
पह्लवान्वर्बरांश्चैव किरातान्यवनाञ्शकान्।
ततो रत्नान्यपादाय वशे कृत्वा च पार्थिवान्।
न्यवर्तत कुरुश्रेष्ठो नकुलश्चित्रमार्गवित्॥ 2-35-17(12832)
करमाणां सहस्राणि कोशं तस्य महात्मनः।
ऊहर्दश महाराज कृच्छ्रादिव महाधनम्॥ 2-35-18(12833)
इन्द्रप्रस्थगतं वीरमभ्येत्य स युधिष्ठिरम्।
ततो माद्रीसुतः श्रीमान्धनं तस्मै न्यवेदयत्॥ 2-35-19(12834)
एवं विजित्य नकुलो दिशं वरुणपालिताम्।
प्रतीचीं वासुदेवेन निर्जितां भरतर्षभ॥ ॥ 2-35-20(12835)

इति श्रीमन्महाभारते सभापर्वणि दिग्विजयपर्वणि पञ्चत्रिंशोऽध्यायः॥ 35॥


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